आर्य समाज ने श्रद्धा और उत्साह से मनाया स्वामी विरजानंद का स्मृति दिवस

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मेरठ । केन्द्रीय आर्य सभा मेरठ के तत्वावधान में महर्षि दयानन्द सरस्वती के गुरु व्याकरण के सूर्य दण्डी स्वामी विरजानन्द सरस्वती का 155वां स्मृति दिवस श्रद्धा एवं समर्पण भाव से आर्यसमाज थापर नगर में मनाया गया। शुभारंभ आचार्य सत्य प्रकाश शास्त्री जी के ब्रह्मत्व में देवयज्ञ से हुआ जिसके यजमान सर्व अपर्णा-अरविंद कुमार रहे। संचालन करते हुए राजेश सेठी ने कहा कि स्वामी विरजानन्द सरस्वती दिव्य प्रतिभा के धनी थे यद्यपि उनके भौतिक नेत्र नहीं थे परंतु उनके ज्ञान नेत्र में अलौकिक शक्ति थी इसलिए उन्हें प्रज्ञाचक्षु कहा जाता है।

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने उन्हें व्याकरण का सूर्य कहा है। उनकी स्मरण शक्ति एवं मेधा बुद्धि अनुपम थी। स्वामी दयानन्द को अपना योग्यतम शिष्य जानकर ही स्वामी विरजानन्द ने उन्हें संसार से अज्ञान अंधकार को दूर कर वैदिक धर्म प्रचार प्रसार का संकल्प दिलाया। प्रसिद्ध आर्य भजनोपदेशक पं अजय आर्य ने प्रभु नाम के अमृत रस का जो प्राणी पान करेगा, उसकी बुद्धि को निर्मल निश्चिय भगवान करेगा। सभी को भक्ति रस में सराबोर कर दिया। उन्होंने भजनों के माध्यम से गुरु शिष्य के मिलन का मार्मिक चित्रण किया।

मुख्य वक्ता आचार्य आनन्द पुरुषार्थी ने बताया कि सन् 1778 में पंजाब के करतारपुर के गंगापुर में जन्मे स्वामी विरजानन्द जी का ब्रजलाल था। पांच साल की उम्र में चेचक से उनकी नेत्र ज्योति चली गई। माता पिता का 12 की आयु में देहांत हो जाने पर उन्होंने घर छोड़ कर दिया और ऋषिकेश आ गये। यहां गंगा में घंटों तक खड़े होकर गायत्री मंत्र का जप किया। स्वामी पूर्णानंद जी से सन्यास ले कर गंगा किनारे होते हुए गंगासागर तक पदयात्रा की। काशी में व्याकरण एवं दर्शन ग्रंथों की शिक्षा प्राप्त की।उनकी विद्वता एवं पांडित्य की किर्ति सर्वत्र व्याप्त थी। अलवर के महाराजा विनय सिंह उनके शिष्य रहे। सन् 1860 में मथुरा में स्वामी दयानन्द सरस्वती उनसे शिक्षा प्राप्त करने पहुंचे। स्वामी जी ने उन्हें अपने कठोर अनुशासन में आर्ष ग्रन्थों की शिक्षा दी तथा व्यकरण के गूढ़ रहस्यों की जानकारी दी जिससे वह वेदों का सही भाष्य करने में सक्षम हुए। हम कभी भी उनके उपकारों से उऋण नहीं हो सकते। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। नेत्रहीन होते हुए भी वह रत्नों की पहचान रखते थे। शतरंज के कुशल खिलाड़ी थे। वीणा वादन में प्रवीण थे। निर्भिक एवं स्पष्ट वक्ता थे हम सभी को उनके जीवन से प्रेरणा लेकर सत्य सनातन वैदिक धर्म प्रचार प्रसार में संलग्न होना चाहिए। सभा के प्रधान डा आर पी सिंह चौधरी ने सभी का आभार व्यक्त किया। मनीष शर्मा, प्रीति सेठी, अशोक सुधाकर, अविरल शर्मा, राज कुमार तोमर, भीष्म आर्य, गोस्वामी, आनन्द प्रकाश त्यागी, रवींद्र सिंह, सुभाष मल्हौत्रा, दिनेश कक्कड़, योगेश मुवार, राजेश पसरिचा, सुशील बंसल, गीता पसरिचा उपस्थित रहे।

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